Sunday, January 7, 2018

ये दिन छुपाव का

आज का ये दिन ढल गया है
और बहुत से दिनों की तरह
और ये रात  चली आयी है
बिन बुलाये जैसे हर बार
कुछ चाह  के भी भला हुआ करता है
अब ये नहीं आएगा वापस
जो भी इसमें था वो सब कुछ
चला गया है इसके साथ
सरके हुए सिरे की तरह
फिसलते से जल को कभी रोका गया है
ढुलते हुए कपोलों पे फिसला है
धरा की रेखा की सी उभर आयी है
और लालिमा घिर आयी है
थके नयनो के कोरों पर
छुपाव से भी कभी क्या हुआ है