Friday, November 10, 2017

चलते हुए मुड़ना नहीं

जब तुम जाओ , चलते हुए मुड़ना नहीं...
मेरे बारे में सोचना,
जानना की मैं तुम्हारी ओर ही ताकती होऊँगी।
पर तुम चलना अपनी ही डगर ,

जब हमारे पथ मिलें कभी
मुझे फिर उतना ही सम्मान देना
फिर वही मान करना मेरा
पर मेरे साथ चलने की हठ न करना

मेरे मन और तुम्हारे मन में ये सब रखना
अपने उच्छवासों को किसी से न जतलाना
बस अच्छी स्मृति रखना
साथ की आकांक्षाएं न करना

चलते हुए मुड़ना नहीं
अपनी डगर चलते ही रहना 

Wednesday, March 15, 2017

संकेत से बोध

 शून्यता का आभास सांकेतिक है
यह संकेत है जीवन के अपूर्णता का
यह पूर्णता का प्रतिबिम्ब भी है
यह समय की सत्यता का प्रतीक है
एवं निर्जीवता का साक्षी भी है
यह है वह छण प्रिय के संग का
और यही है सतत विछोह का
यह वह बिंदु है जिस पर ज्या चली
और यही उस परिधि की धुरी

शून्यता का आभास सांकेतिक है
यह मृदा की मृदुता एवं सुगंध है
यही मन में जमी मृदा का उच्छवास है

यह संकेत छण भंगुर है रहता नहीं
नष्ट हुए संकेत भी शून्य ही हैं
शून्यता के बोध में संकेत नहीं है
क्योंकि तब सब ही शून्य में लय है 

Sunday, January 8, 2012

रात की रानी

मुरझाई, कुम्हलाई, फिर तुमने सहलाई
छुअन भर से भरभराई  और इतराई
झरी कभी थी अब यौवन से भरी
फूली और सारी रैन महकी
हिया हरषाई प्रिय को भाई
री रात की रानी बड़ी सुहाई 

Tuesday, March 8, 2011

तुम्हारी धूप

री धूप छनी, छन कर गिरी,

तीखी अब तक हुई नहीं

सोह सोह , सोह के सोखी

पूरे तन को गरमाई, जब जब मैं इसमे नहाई,

छू गई और अंतर मे समाई

कभी तो लगी भली

कभी तनिक न सुहाई

मेरे मन मे प्रिय के संग सी

प्रिय के बिना भला क्यूँ आई

छुपी दुबकी मैं बची इस से अब भागी

नहीं नहीं बिन तुम मुझे धुप न भाई

Friday, February 4, 2011

दर्पण मैं तेरा

मैं तेरा दर्पण हूँ जब मैंने कहा
तो उसने कहा की तुने कैसे ये जाना
जब तक मैंने न तुझको दर्पण माना
मुस्काए लजाये मैंने हाँथ डाले…
धीमे से… ध्यान से
उसे उसकी छबी दिखाई अपने अंतर मे
तो बोला अरे ये तो है सुन्दर दर्पण
फिर बोला मेरी छबी ही है सुन्दर
मन हिलोरे ले के बोला…
चाहे छबी के कारण…
चाहे अपने अभिमान के करना
कैसे सही तुमने अंततः
मुझे अपना दर्पण तो माना

Monday, July 5, 2010

सांवरी

झुके नयन, जैसे नत डाली,
झुकाए जिसे,बरखा मतवाली,
रोके जल को, पल पल्लवों मे,
झराए तब ही, जब भावो से झकझोरी

स्नेह से स्निग्ध, कपोल अधर सब,
भीगे पसीजे से, बरखा तर सो ही
वसित आज के और , कल के लिए भी,
जैसे सहेजे ताल औ पोखरी,

गोरी चले जब तन झुक तन, कभी
जैसे मद सावन का या की माया सांवरी की

Tuesday, June 8, 2010

बरखा फिर आई

अंग लगा जब कहा
बधाई पहली बारिश की...
हडबडाकर दुबका मन मे मेरे
हर्ष सा ... फिर उठा ... भय सा
बधाई मैंने भी दी उनको
आलिंगन जब छूटा
समझा फिर खुद को
भय क्यूँ हो वर्षा से
घुमड़ कर बादलों ने कहा
भय क्यूँ हुआ तुझको
समय जब फिर है बदला
तब थिथिरण क्यूँ हो
पहली ही उन बूंदों ने
चखकर स्वाद अपना
कहा खुश हो अब तो

अरे ओ मेघ सुन रे
अरी ओ बरखा रानी
तू भी सुन
भीगा कर तन को मेरे
थिरक कर वस्त्र पर सारे
न जाना तुमने
मन को मेरे

प्रिय है मेरे पास
फिर भी मन की टीस
साथ मेरे साथ के
पर बात है नहीं

बदल घुमरे और बरखा भी
फिर भी प्रिय संवाद न हो
तो मन मे भय है की
आज तो साथ है
क्या पता
कल साथ न हो

मन की उलझन
उलझी फिर फिर
तप्त मन लिए खड़ी मैं वर्षा मे

धीमे धीमे धुला
म्लान और छंटा बुरा सब अनुमान
प्रिय ने धीमे कदमो से आकर
जब थामा मेरे डुलते मन को
छुअन की सिहरन
चली की बरखा ने ली चिट्कोली
अरी बड़ी चली संसयों वाली
अभी हमने देखि तुम्हरी
ऋतू की तय्यारी

प्रिय जो ऐसा पास ये है
और ये कहती बात न है
सुन बरखा की बात
मेरे मन ने भी ली अंगड़ाई
भय तो पहले ही दुबका था
अब उसने की भागने की तय्यारी
:)
:)