री धूप छनी, छन कर गिरी,
तीखी अब तक हुई नहीं
सोह सोह , सोह के सोखी
पूरे तन को गरमाई, जब जब मैं इसमे नहाई,
छू गई और अंतर मे समाई
कभी तो लगी भली
कभी तनिक न सुहाई
मेरे मन मे प्रिय के संग सी
प्रिय के बिना भला क्यूँ आई
छुपी दुबकी मैं बची इस से अब भागी
नहीं नहीं बिन तुम मुझे धुप न भाई
Tuesday, March 8, 2011
Friday, February 4, 2011
दर्पण मैं तेरा
मैं तेरा दर्पण हूँ जब मैंने कहा
तो उसने कहा की तुने कैसे ये जाना
जब तक मैंने न तुझको दर्पण माना
मुस्काए लजाये मैंने हाँथ डाले…
धीमे से… ध्यान से
उसे उसकी छबी दिखाई अपने अंतर मे
तो बोला अरे ये तो है सुन्दर दर्पण
फिर बोला मेरी छबी ही है सुन्दर
मन हिलोरे ले के बोला…
चाहे छबी के कारण…
चाहे अपने अभिमान के करना
कैसे सही तुमने अंततः
मुझे अपना दर्पण तो माना
तो उसने कहा की तुने कैसे ये जाना
जब तक मैंने न तुझको दर्पण माना
मुस्काए लजाये मैंने हाँथ डाले…
धीमे से… ध्यान से
उसे उसकी छबी दिखाई अपने अंतर मे
तो बोला अरे ये तो है सुन्दर दर्पण
फिर बोला मेरी छबी ही है सुन्दर
मन हिलोरे ले के बोला…
चाहे छबी के कारण…
चाहे अपने अभिमान के करना
कैसे सही तुमने अंततः
मुझे अपना दर्पण तो माना
Monday, July 5, 2010
सांवरी
झुके नयन, जैसे नत डाली,
झुकाए जिसे,बरखा मतवाली,
रोके जल को, पल पल्लवों मे,
झराए तब ही, जब भावो से झकझोरी
स्नेह से स्निग्ध, कपोल अधर सब,
भीगे पसीजे से, बरखा तर सो ही
वसित आज के और , कल के लिए भी,
जैसे सहेजे ताल औ पोखरी,
गोरी चले जब तन झुक तन, कभी
जैसे मद सावन का या की माया सांवरी की
झुकाए जिसे,बरखा मतवाली,
रोके जल को, पल पल्लवों मे,
झराए तब ही, जब भावो से झकझोरी
स्नेह से स्निग्ध, कपोल अधर सब,
भीगे पसीजे से, बरखा तर सो ही
वसित आज के और , कल के लिए भी,
जैसे सहेजे ताल औ पोखरी,
गोरी चले जब तन झुक तन, कभी
जैसे मद सावन का या की माया सांवरी की
Tuesday, June 8, 2010
बरखा फिर आई
अंग लगा जब कहा
बधाई पहली बारिश की...
हडबडाकर दुबका मन मे मेरे
हर्ष सा ... फिर उठा ... भय सा
बधाई मैंने भी दी उनको
आलिंगन जब छूटा
समझा फिर खुद को
भय क्यूँ हो वर्षा से
घुमड़ कर बादलों ने कहा
भय क्यूँ हुआ तुझको
समय जब फिर है बदला
तब थिथिरण क्यूँ हो
पहली ही उन बूंदों ने
चखकर स्वाद अपना
कहा खुश हो अब तो
अरे ओ मेघ सुन रे
अरी ओ बरखा रानी
तू भी सुन
भीगा कर तन को मेरे
थिरक कर वस्त्र पर सारे
न जाना तुमने
मन को मेरे
प्रिय है मेरे पास
फिर भी मन की टीस
साथ मेरे साथ के
पर बात है नहीं
बदल घुमरे और बरखा भी
फिर भी प्रिय संवाद न हो
तो मन मे भय है की
आज तो साथ है
क्या पता
कल साथ न हो
मन की उलझन
उलझी फिर फिर
तप्त मन लिए खड़ी मैं वर्षा मे
धीमे धीमे धुला
म्लान और छंटा बुरा सब अनुमान
प्रिय ने धीमे कदमो से आकर
जब थामा मेरे डुलते मन को
छुअन की सिहरन
चली की बरखा ने ली चिट्कोली
अरी बड़ी चली संसयों वाली
अभी हमने देखि तुम्हरी
ऋतू की तय्यारी
प्रिय जो ऐसा पास ये है
और ये कहती बात न है
सुन बरखा की बात
मेरे मन ने भी ली अंगड़ाई
भय तो पहले ही दुबका था
अब उसने की भागने की तय्यारी
:)
:)
Wednesday, April 7, 2010
झिरे के पार
झिर झिर दिखाया, जो तन प़र था,
मन का झिराया, तो कभी न दिखा,
झिरा दिखा, झिरे के पार न दिखा...
मुख से कहा, तो बुरा ही था
नयनो के कोर का, रह ही गया
तोल के बोला न गया , ना बातों का मोल रहा
चाहा क्या क्या, सुना कब था,
पाया क्या क्या, ये ही गिना,
गिन के ढेर लगाया, ढेर मे पैर लगाया
एक अनकहा, चला धीमे धीमे,
और एक कहकहा तेज़ चला
चला तेज, मुह के बल गिरा, उठाने को संबल न मिला
हाँथ जो थमा हर पल था
साथ जो चाहा प़र न मिला
हाँथ बढाया तिस प़र भी हाँथ का दायाँ बांया दिखा
झिरा दिखा, झिरे के पार न दिखा
मन का झिराया, तो कभी न दिखा,
झिरा दिखा, झिरे के पार न दिखा...
मुख से कहा, तो बुरा ही था
नयनो के कोर का, रह ही गया
तोल के बोला न गया , ना बातों का मोल रहा
चाहा क्या क्या, सुना कब था,
पाया क्या क्या, ये ही गिना,
गिन के ढेर लगाया, ढेर मे पैर लगाया
एक अनकहा, चला धीमे धीमे,
और एक कहकहा तेज़ चला
चला तेज, मुह के बल गिरा, उठाने को संबल न मिला
हाँथ जो थमा हर पल था
साथ जो चाहा प़र न मिला
हाँथ बढाया तिस प़र भी हाँथ का दायाँ बांया दिखा
झिरा दिखा, झिरे के पार न दिखा
Thursday, March 4, 2010
पतझड़
पतझड़... कब आया... चल चुपचाप पद...
हम जो चले उसके आने पर...
तो कह कर खड़ खड़ खड़...
चुप बैठे ये ऐसा नहीं...
वसंत से लड़े नहीं पर
वसंत पर बैठे चढ़ चढ़..
हम जो चले उसके आने पर...
तो कह कर खड़ खड़ खड़...
चुप बैठे ये ऐसा नहीं...
वसंत से लड़े नहीं पर
वसंत पर बैठे चढ़ चढ़..
Tuesday, December 29, 2009
लाल
रस और लस मे अटका है
और
रस और लस मे भटका है
झोंक से आ कर लिपटा है
और
झोंक से ही तो भभका है
पलट के ताप सा गर्म भी है
और
लपट की ऑट सा ठंडा है
तेज है और क्रोध भी है
और
रजस है और काम भी है
व्यग्र यही है, है निश्चित भी
अरे यह
तत्पर भी है पर निश्चिन्त नहीं
माता का है तो दुलार है
और
गोदरी का है तो छुपाव है
लाल है जी लाल है
हाँ ये
लाल ही तो है
और
रस और लस मे भटका है
झोंक से आ कर लिपटा है
और
झोंक से ही तो भभका है
पलट के ताप सा गर्म भी है
और
लपट की ऑट सा ठंडा है
तेज है और क्रोध भी है
और
रजस है और काम भी है
व्यग्र यही है, है निश्चित भी
अरे यह
तत्पर भी है पर निश्चिन्त नहीं
माता का है तो दुलार है
और
गोदरी का है तो छुपाव है
लाल है जी लाल है
हाँ ये
लाल ही तो है
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