रख छोडा मेरे संशय को मैंने जहाँ
वो वैसे ही रहा पड़ा वहीँ का वहां
तुमने तो था उसे देखा, वो और उसका
अनचाहा प्रतिभूत... सिमट सहम
दृष्टी को तुम्हारी ही तरसा वो रोम रोम
निर्दिष्ट भावनाओ के लिए है ही क्या
उत्तरों की आस मे ये अस्तित्व
अनुत्तरित अनेक प्रश्नों के प्रतिबिम्ब
और उनके बीच
ये संशय मेरे ह्रदय का
चले कभी खींच और कभी भींच
Monday, October 13, 2008
Tuesday, September 30, 2008
पलायन फ़िर से
पलायन फ़िर से,
आशाओं के झंझा से दूर
प्रत्याशा के बोझ से मजबूर
मेरे मन का विद्रोह ये
छूटते अवसरों का प्रतिरोध
ये चुपचाप रुंदन
छोड़ अब...
जीवन चल पड़ाव नहीं अब
सामने बढ़ ... की बस चल ही चल
पलायन फ़िर से
बिखरे yऔवानो के परे
गूंजते कलरवों से दूर
अब बह बस बह...
और कल कल
पलायन है अस्तित्व से ही
अब से अब से
आशाओं के झंझा से दूर
प्रत्याशा के बोझ से मजबूर
मेरे मन का विद्रोह ये
छूटते अवसरों का प्रतिरोध
ये चुपचाप रुंदन
छोड़ अब...
जीवन चल पड़ाव नहीं अब
सामने बढ़ ... की बस चल ही चल
पलायन फ़िर से
बिखरे yऔवानो के परे
गूंजते कलरवों से दूर
अब बह बस बह...
और कल कल
पलायन है अस्तित्व से ही
अब से अब से
Wednesday, September 24, 2008
चाह गुम राह गुम
वो रात के चार कदम आवारा
वो भूली बातें और बातों का व्यारा
वो गूंजे निशब्द
और शांत से अंतर्द्वंद
वो चलाचल का साथ
और साथ का दुराव
जब वो चले झुन झुन
जब वो गुमे गुम गुम
तुमने दिया जो थोड़ा कुछ
तुमसे लिया जो वो सब कुछ
ताक पर सब क्यूँ.... चाह ही गुम क्यूँ
राह जब बदली तो राह ही गुम क्यूँ.
वो भूली बातें और बातों का व्यारा
वो गूंजे निशब्द
और शांत से अंतर्द्वंद
वो चलाचल का साथ
और साथ का दुराव
जब वो चले झुन झुन
जब वो गुमे गुम गुम
तुमने दिया जो थोड़ा कुछ
तुमसे लिया जो वो सब कुछ
ताक पर सब क्यूँ.... चाह ही गुम क्यूँ
राह जब बदली तो राह ही गुम क्यूँ.
Tuesday, September 2, 2008
जंत्र
साँझ के धुंधलके का वो कालापन
दिन को झुठलाता धीमा आगमन
जैसे चुपचाप मे पुनर्वसन
धोया इतना धुला नहीं
करे बस तन ही आचमन
सरल नहीं कुछ कह लो कितना
जटिल जंत्र सा ये जीवन
दिन को झुठलाता धीमा आगमन
जैसे चुपचाप मे पुनर्वसन
धोया इतना धुला नहीं
करे बस तन ही आचमन
सरल नहीं कुछ कह लो कितना
जटिल जंत्र सा ये जीवन
Thursday, August 28, 2008
बहके ही बहके
बिखरी बिखरी सी तहें
उलझी उलझी सी लटें
छूटे छूते वो कहकहे
जाने कब के अनकहे
वो साथ रहें बस यही मन कहे
फ़िर फ़िर हम उनकी राह मुडे
कभी मन और कभी कदम चले
मिल मिल कर भी मिलाने को तरसे
कभी मह कभी नेह बरसे
किसे पता की हैं सधे या हैं बहके
Wednesday, August 27, 2008
संग का निस्संग
प्रणय के प्रतिछण, मैंने देखि तुम्हारी आस
रमण का मधुबन हुआ तुम्हारे बिन उदास
रहे वही पर अनछुए , जब चुने पर थर्राई
लता ने कह दी , जैसे मेरे मन की बात
रहे जो विचलित, कभी सशंकित, बिलखे अब तो ये प्रलाप
कहे मंजरी फूट फूट सारे अंगों मे आलाप
गुंजन मधुर था, जो जाने कब बना चीत्कार
रहे जो प्रिय मेरे बन, नहीं है बस का
संग रह निस्संग वास ...
Wednesday, July 23, 2008
करीब
पास हुए की बहुत दूर हो गए
खास हुए की बहुत रोज हो गए
कब कही थी कभी दिल की बात हमसे
कभी चुभी तब यूँ ही कही बात ... कबसे
कभी बहुत थे खुश कभी ग़मगीन हो गए
न चंद राहें आम सी होती
न चंद आहें राज की होती
कभी जो हम थे गुम और कभी मशहूर हो गए
किनारों पर खड़े देखने की आदत न थी
इक लहर से जो लड़े तो चूर हो रहे
खास हुए की बहुत रोज हो गए
कब कही थी कभी दिल की बात हमसे
कभी चुभी तब यूँ ही कही बात ... कबसे
कभी बहुत थे खुश कभी ग़मगीन हो गए
न चंद राहें आम सी होती
न चंद आहें राज की होती
कभी जो हम थे गुम और कभी मशहूर हो गए
किनारों पर खड़े देखने की आदत न थी
इक लहर से जो लड़े तो चूर हो रहे
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