हर सावन के बाद हर कहीं फूल खिले
मन का कोना भरा मंजरियों से किलके
मेरे मन के आँगन मे जाने,
किस सावन के पैर पड़े
हर सावन के बाद हर कहीं फूल खिले
Thursday, January 3, 2008
rat ka parijat
पारिजात फूला तो रात हुई
रजनीगंधा की गंध से सुवासित
धुली चाँदनी से आलोकित
ओस की बूंदों से नहाई
सुंदर शांत रात हुई
जागे सरे निशाचर , जग सोया तो रात हुई
कलियाँ chthaki, पवन बही तो रात हुई
ऐसी ही रातों मे जागूं और देखूं सब ही
मन ने जब जब ऐसा चाह रात हुई
रात्रि का सौन्दर्य निर्मल
दिवस से अधिक अनुपम
डूबी इस सौन्दर्य मे
आनंदाम्रित बरसा सचमुच रात हुई
रजनीगंधा की गंध से सुवासित
धुली चाँदनी से आलोकित
ओस की बूंदों से नहाई
सुंदर शांत रात हुई
जागे सरे निशाचर , जग सोया तो रात हुई
कलियाँ chthaki, पवन बही तो रात हुई
ऐसी ही रातों मे जागूं और देखूं सब ही
मन ने जब जब ऐसा चाह रात हुई
रात्रि का सौन्दर्य निर्मल
दिवस से अधिक अनुपम
डूबी इस सौन्दर्य मे
आनंदाम्रित बरसा सचमुच रात हुई
pehchan
मैं कितनों को जानती हूँ
कितने चहरे, कितनी बातें,
कितने ही व्यक्तिव और कृतित्व
जानूं कितनों को और कितने मुझे जाने
अपने अंतरतम मे झान्कूं देखूं,
क्या जाना मैंने ख़ुद को?जानूं किसको,
ख़ुद से अनजान रह कर?
सब मुझे जाने ये चाहूँ कैसे?
ख़ुद ही ख़ुद को न जान कर.
ख़ुद को जानूं, तब उसको जानू,
तब कोई जाने न जाने मुझको
कितने चहरे, कितनी बातें,
कितने ही व्यक्तिव और कृतित्व
जानूं कितनों को और कितने मुझे जाने
अपने अंतरतम मे झान्कूं देखूं,
क्या जाना मैंने ख़ुद को?जानूं किसको,
ख़ुद से अनजान रह कर?
सब मुझे जाने ये चाहूँ कैसे?
ख़ुद ही ख़ुद को न जान कर.
ख़ुद को जानूं, तब उसको जानू,
तब कोई जाने न जाने मुझको
mera ankaha
कोई सुने वो अनकहा
जिसे मैंने किसी से न कहा
सबके अपने अपने श्रोता
और अपनी कथा
कहे हर कोई जिससे,
अपने मन की व्यथा
बन गई हूँ मैं ऐसा ही श्रोता
कहूं किससे अपनी बातें
कोई सुने वो अनकहा
जिसे मैं किसी से न कहा
जिसे मैंने किसी से न कहा
सबके अपने अपने श्रोता
और अपनी कथा
कहे हर कोई जिससे,
अपने मन की व्यथा
बन गई हूँ मैं ऐसा ही श्रोता
कहूं किससे अपनी बातें
कोई सुने वो अनकहा
जिसे मैं किसी से न कहा
mujhase bara mera aham
मैं, मैं बस मैं, और मेरा अहम्
मैं जो कह दूँ चल पड़े सब ही अभी,
और जो कह दूँ मैं तो थम जाए वहीं,
उडून ऊंचा एक कर धरती गगन,
मैं बस मैं और मेरा अहम्
हो अगर विश्वास मन मे सीमा से ज्यादा,
क्या करेगा अहित या कि फायदा
अंत मे टूट न जाए रूककर सहम
मैं, मैं बस मैं और मेरा अहम्
कैसे रोकूँ? थामु इसे किस मोर पर?
और क्या ही मिल सकेगा लक्ष्य इसको रोक कर?
टूटे अगर है ये महज एक वहम
मैं, मैं बस मैं और मेरा अहम्
मैं जो कह दूँ चल पड़े सब ही अभी,
और जो कह दूँ मैं तो थम जाए वहीं,
उडून ऊंचा एक कर धरती गगन,
मैं बस मैं और मेरा अहम्
हो अगर विश्वास मन मे सीमा से ज्यादा,
क्या करेगा अहित या कि फायदा
अंत मे टूट न जाए रूककर सहम
मैं, मैं बस मैं और मेरा अहम्
कैसे रोकूँ? थामु इसे किस मोर पर?
और क्या ही मिल सकेगा लक्ष्य इसको रोक कर?
टूटे अगर है ये महज एक वहम
मैं, मैं बस मैं और मेरा अहम्
kya ho ek nishchint saath
सावन ये झर झर और मेरे मन का उदास
सारे किलके चहक चहक तो क्यों मैं यूं निराश
मन का मेरे निशब्द और शब्दों को जितने का प्रयास
रुकने को चर जगत न मने, बस का नहीं ये सतत प्रयाण
थके रुके सब कोलाहल से दूर हो मेरा वास
किंतु निस्संग, अनुत्तरित, स्वयं पर ही न हो जाए आधार
समय सरित ने कहा की बह चल, चलने मे ही है आस
अब और नहीं एकाकी, इच्छित है एक निश्चिंत साथ
सारे किलके चहक चहक तो क्यों मैं यूं निराश
मन का मेरे निशब्द और शब्दों को जितने का प्रयास
रुकने को चर जगत न मने, बस का नहीं ये सतत प्रयाण
थके रुके सब कोलाहल से दूर हो मेरा वास
किंतु निस्संग, अनुत्तरित, स्वयं पर ही न हो जाए आधार
समय सरित ने कहा की बह चल, चलने मे ही है आस
अब और नहीं एकाकी, इच्छित है एक निश्चिंत साथ
meri iti
जल ही जल है, जल का तल है
लय होता है मन मेरा
सागर सम होने को इस तल मे खोने को
चाहे अब तो मन मेरा
विशालता और गहराई, जो न नापी जाए
थाह उसकी पाने को चाहे अब तो मन मेरा
या तो जानू तत्व को इसके
या हो जाऊं मैं भी यही
चाहूँ ये ही हो मेरी अंत इति
लय होता है मन मेरा
सागर सम होने को इस तल मे खोने को
चाहे अब तो मन मेरा
विशालता और गहराई, जो न नापी जाए
थाह उसकी पाने को चाहे अब तो मन मेरा
या तो जानू तत्व को इसके
या हो जाऊं मैं भी यही
चाहूँ ये ही हो मेरी अंत इति
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