Tuesday, September 2, 2008

जंत्र

साँझ के धुंधलके का वो कालापन
दिन को झुठलाता धीमा आगमन
जैसे चुपचाप मे पुनर्वसन
धोया इतना धुला नहीं
करे बस तन ही आचमन
सरल नहीं कुछ कह लो कितना
जटिल जंत्र सा ये जीवन

Thursday, August 28, 2008

बहके ही बहके

बिखरी बिखरी सी तहें

उलझी उलझी सी लटें

छूटे छूते वो कहकहे

जाने कब के अनकहे

वो साथ रहें बस यही मन कहे

फ़िर फ़िर हम उनकी राह मुडे

कभी मन और कभी कदम चले

मिल मिल कर भी मिलाने को तरसे

कभी मह कभी नेह बरसे

किसे पता की हैं सधे या हैं बहके

Wednesday, August 27, 2008

संग का निस्संग

प्रणय के प्रतिछण, मैंने देखि तुम्हारी आस

रमण का मधुबन हुआ तुम्हारे बिन उदास

रहे वही पर अनछुए , जब चुने पर थर्राई

लता ने कह दी , जैसे मेरे मन की बात

रहे जो विचलित, कभी सशंकित, बिलखे अब तो ये प्रलाप

कहे मंजरी फूट फूट सारे अंगों मे आलाप

गुंजन मधुर था, जो जाने कब बना चीत्कार

रहे जो प्रिय मेरे बन, नहीं है बस का

संग रह निस्संग वास ...

Wednesday, July 23, 2008

करीब

पास हुए की बहुत दूर हो गए
खास हुए की बहुत रोज हो गए

कब कही थी कभी दिल की बात हमसे
कभी चुभी तब यूँ ही कही बात ... कबसे
कभी बहुत थे खुश कभी ग़मगीन हो गए

न चंद राहें आम सी होती
न चंद आहें राज की होती
कभी जो हम थे गुम और कभी मशहूर हो गए

किनारों पर खड़े देखने की आदत न थी
इक लहर से जो लड़े तो चूर हो रहे

Wednesday, July 2, 2008

बर्र और मधुमखी

एक समय की बात
बर्र ने मधुमख्ही से प्रश्न किया
तू भोंडी मैं सुघड़ नवेली
चमकदार हैं पर मेरे
फ़िर भी जाने क्यूँ नर मानस चर
गुन ग्राहक हैं बस तेरे

मतलब का है खेल सखी री
मतलब से ही सूझ
सुन मधुमख्ही ये कहती है
मैं देती हूँ मधु लोगों को
तू केवल दस लेती है

Thursday, May 15, 2008

अनजाने पन्ने मेरे घर मे

पन्नों की बिखरी तहें

खुली फिर फिर से,

हर तह एक कहानी

सुनी ख़ुद ही, ख़ुद कह के.

सुन्न वो हाँथ, कम्पित तन,

सशंकित मन,

समझाइश न जाने , किस किस से.

चलते द्वंद , भयंकर तम,

गूंजे भूकंप, प्रति स्वास मे.

कब हो प्रयाण ,

निश्चित कुछ ज्ञान,

कुछ जन, कुछ अनजान

अब रहे कब से, भूले कब से.

Thursday, April 17, 2008

विचारों मे हर छण यूं घटायें घिरी

कब कब और कितना किसको बताई छुपाई

कुछ जाने वो , रही कुछ अनजानी

बरसी अभी बस अब ही थी बरसी

बरसने को ही जाने बरसों तरसी

अब जबकि वो aबी बरसी बर बस ही

कभी फंसी और कभी खुली

कभी रची और कभी धुली

न मेरी लट सुलझी न मेहंदी रची

राह न जाने किसकी तकी

और न जाने किस राह पड़ी